My Latest 24 Poetry Sad, love and BrokenHeart Collection

My Latest 24 Poetry

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१. आ कभी मेरी शामों में शमा जलाने,,,
आ कभी मेरे आगोश में तन्हाई मिटाने।
तू कभी बरस मुझ पर इत्र की तरह,,,
में कभी बिखरुं फूलों सा तेरा गलीचा सजाने।।

२. यूँ कभी चाँद को तुझमें देखा,,,
कभी तुझको चाँद में देखा।
बन गया जमीं पर सागर तेरे नाम का,,,
तेरी यादों का एक कतरा आंख से निकाल कर फेंका।।

३. हमनें!!!!
कभी खुद से पर्दा किया,,,,
तो कभी ख्वाबों को जर्दा किया।
कभी जख्मों पर खुद ही मुस्कुरा लिए,,,
कभी आंखों को सुर्ख किया।।
जो भी किया तेरी यादों में किया!!!
कभी खुशियों को रुसवा किया,,,,
कभी शोहरत को तबाह किया।।

४.तुम्हें सहलाने का मन करता है,,,
तुम्हें बहलाने का मन करता है।
कहीं तुम मैले न हो जाओ मेरी छुअन से
ये दिल इस बात से डरता है,

५.हाल-ए-दिल अपना सुनाऊँ कैसे,,,,
तुम बेवजह रूठे बैठे हो, तुम्हें मनाऊं कैसे।

६.यूँ ही नहीं रिसती मेरी आंखें,,,
उन्होंने ही कूंच दी!!!!
कभी जिन्हें पलकों पर बिठाया था।।

७. सुनो!!!
आज तुम्हें अपनी मुहब्बत बना लेने दो हमको,,,
किताबों में अपनी सजा लेने दो तुमको।
अब तक;;;;;
मेरे इश्क की किताब अभी कोरी है,,
कुछ तो इश्क का रंग बिखेर दो उस पर।।
आज अपना नाम लबों पर सजा लेने दो हमको
उस किताब का किरदार बना लेने दो तुमको।।।

८.सदियों के चले तराने हैं,,,,
अपने ही हश्र से अनजाने हैं।
जो घूमा करते थे, नगर की गलियों में,,,,
वो आज अपनी ही दहलीज पर बे-गाने हैं

९. वो अक्सर मेरे जख्म कुरेदता रहता है,,,,
मेरा वक्त,,
वक्त बे-वक्त मुझे छेड़ता रहता है।
न जाने क्या सुकून मिलता है, उसको,,,
मुझे जला कर,,,
वो रोज अपनी रोटियां सेकता रहता है।।

१०. जल भी जाऊं!!!
परवाह नही, जला अगर मैं तेरी छुअन से,,,
मेरी मंजिल न सही!!!
मुझे तेरे इश्क़ का हसीन मुकाम तो हासिल होगा।

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११. इस कदर तुमसे रहे हम बेखबर,,,
के कहीं और दिल लगा बैठे।
लोग जलते हैं अंगारों से,,
और हम बर्फ से हाथ जला बैठे।।
अगर होता इश्क तुमसे इस कदर,,,
जैसा उससे इश्क हम निभा बैठे।
लोग कोसते हैं, अपनी लकीरों को,,
और हम अपनी लकीरें खुद मिटा बैठे।।

१२. तुम!!!!
मेरे दिल के गलीचे में आकर,,
उसे बाग-बाग कर दो।
सुनकर मेंरी अर्जी,,
मुझपर एक एहसान आज कर दो।।
लिए बैठा हूँ,, कुछ दिल के,,
काँच से टुकड़े अपने आगोश मे।
तुम भी अपने दिल के कुछ टुकड़े,,
इनमें आज जड़ दो।।
तुम मुझपर ये एहसान आज कर दो!!!

१३. कभी तो आ जाओ,,,,
इस दिल के तहखाने में।
कभी तो दीये जला जाओ,,,
मेरे वीरान शामियाने में।।
सदियों से ठोकर खाए बैठा हूँ,,
इन अंधेर गलियारों में।
कभी तो आ जाओ,,
इन अंधेरों से बचाने हमें।।

१४. नहीं हैं!!! मेरे होश ठिकाने पर,
जब से एक हसीन नज़र से ,
जो हमें प्यार हुआ है।
बिन काटे ही बह रहा है लहू,,,
उनकी निगाहों के ख़ंजर से
हम पर वार जो हुआ है।।
खींच रहे हैं हमको अपनी तरफ!!
ये उनकी नशीली निगाहें,गुलाबी गाल,,
पंखुड़ियों जैसे होठ और सुनहरे बाल।
ये पागल कर देने वाली अदाएं,,
और उनकी वो मस्तानी चाल।।

१५. सुनो!!!!!!!!
तुम मेरे दिल का चैन चुराती हो,,,
जब भी इस कदर मुस्कुराती हो।
मुझसे गैरों सा बर्ताव करता है,ये दिल,,,
जब भी तुम मुझे अलविदा कह जाती हो।।

१६.समेट ले,,,,ये इश्क की चादर,,,,
चल इस जमाने से हवा हो जाएं।
खो जाएं कहीं मुहब्बत के जंगल में,,,,
छूते हुए!!!! लबों को लबों से,,,
ओढ़ कर इश्क की चादर
आ ! एक दूजे कि बांहों में सो जाऐं।।।

१७. गलत नहीं
उस घर की!!!!!!
बुनियादें हिल जाती हैं,,,
जिस घर का संसार बिखर जाता है।।।

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१८. सीलन सी दिख रही है, तुम पर
समेटे बैठे हो क्या! कोई बेबसी का किस्सा,,
उधड़ती परतें बयान कर रही हैं,,
तुम्हारी ये। तकलीफों का हिस्सा,,,

१९. किसी ने पूछा
किस नें ये तेरा हाल किया है,,
हमने भी उसको जवाब दिया है।
बहुत हैं,,,,
अब किस किस का नाम लूँ,,
और गलती भी अपनी ही थी।
जो बेवजह गलतफहमियां पाल लीं,,
अब तुम ही बताओ किस किस को इल्जाम दूँ।।

२०. आओ तुम्हें भी एक जाम दूँ,,,
जो बचा है, कुछ मुठ्ठी भर सा।
आज तुमको वो सारा ईमान दूँ,,
मिले हैं इसमें, मेरे इश्क़ के आंसू
एक पैग में भर के मुहब्बत के पैगाम दूँ,,,
कड़वा लगे तो माफ करना यारो
गमों की चलती दुकान हूँ,,,,

२१. गुलाब, ख्वाब, दवा, ज़हर , जाम क्या क्या है,,
में आ गया हूँ, बता इंतज़ाम क्या क्या हैं।
फक़ीर, शाह, कलंदर, इमाम क्या क्या है,,
तुझे पता नहीं, तेरा गुलाम क्या क्या है।।

२२. लोग हर मोड़ पर रुक – रुक के संभलते क्यों है
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लोग हर मोड़ पर रुक – रुक के संभलते क्यों है,,
इतना डरते है तो फिर घर से निकलते क्यों है।
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मैं ना जुगनू हूँ, दीया हूँ, ना कोई तारा हूँ,,,
रौशनी वाले मेरे नाम से जलते क्यों हैं।।
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नींद से मेरा ताल्लुक ही नहीं बरसों से,,
ख्वाब आ-आ के मेरी छत पे टहलते क्यों हैं।
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मोड़ तो होता हैं जवानी का संभलने के लिये,,
और सब लोग यही आकर फिसलते क्यों हैं।।

२३. नशा उस सा है, या
वो नशे सी है,,,
झूम लेते हैं, हम दोनों ही सूरतों में
चाहें हो जाम,,,या उसका नाम,,
सर चढ़ ही जाता है,,
ये बात भी पते की है,,,

२४.बस””””
समेटे हुए बैठा था खुद को अब तक,,,
कल फिर किसी ने पत्थर मार के बिखेर दिया!!!
कुछ समझ पाता जब तक,,,
एक तिनका न बचा!!!!

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