Harivanshrai Bachchan famous beautiful Hindi Poetry

Harivanshrai Bachchan famous Poetry- प्राण कह दो ,,, आ रही है रवि की सवारी,,, अग्निपथ अग्निपथ अर्द्ध रात्रि, ,,,,मर्दुल इच्छा,,,,,जीवन की आपाधापी

प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो!


मैं जगत के ताप से डरता नहीं अब,,
मैं समय के शाप से डरता नहीं अब।
आज कुंतल छाँह मुझ पर तुम किए हो,,
प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो।।
रात मेरी, रात का श्रृंगार मेरा,,
आज आधे विश्व से अभिसार मेरा।


तुम मुझे अधिकार अधरों पर दिए हो,,
प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो!!


वह सुरा के रूप से मोहे भला क्या,
वह सुधा के स्वाद से जाए छला क्या।
जो तुम्हारे होंठ का मधु विष पिए हो,,
प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो।।
मृत संजीवन था तुम्हारा तो परस ही,,
पा गया मैं बाहु का बंधन सरस भी।


मैं अमर अब, मत कहो केवल जिए हो,,
प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो!

आ रही रवि की सवारी,,
नव किरण का रथ सजा है।
कलि कुसुम से पथ सजा है,,
बादलों से अनुचरों ने स्‍वर्ण की पोशाक धारी।।


आ रही रवि की सवारी,,
विहग, बंदी और चारण।
गा रही है कीर्ति गायन,,
छोड़कर मैदान भागी, तारकों की फ़ौज सारी।।


आ रही रवि की सवारी,,
चाहता, उछलूँ विजय कह।
पर ठिठकता देखकर यह,,
रात का राजा खड़ा है, राह में बनकर भिखारी।।


आ रही रवि की सवारी!!

वृक्ष हों भले खड़े,,
हों घने हों बड़े।
एक पत्र छाँह भी,,
माँग मत, माँग मत, माँग मत।।


अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ!


तू न थकेगा कभी,,
तु न रुकेगा कभी।
तू न मुड़ेगा कभी,,
कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ।।


अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ!!


यह महान दृश्य है,,
चल रहा मनुष्य है।
अश्रु श्वेत रक्त से,,
लथपथ लथपथ लथपथ।।


अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ!!!

Harivanshrai Bachchan famous

Harivanshrai Bachchan famous

अर्द्ध रात्रि में सहसा उठकर,,
पलक संपुटों में मदिरा भर।
तुमने क्यों मेरे चरणों में अपना तन-मन वार दिया था,,
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?


यह अधिकार कहाँ से लाया,,
और न कुछ मैं कहने पाया।
मेरे अधरों पर निज अधरों का तुमने रख भार दिया था,,
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?


वह क्षण अमर हुआ जीवन में,
आज राग जो उठता मन में –
यह प्रतिध्वनि उसकी जो उर में तुमने भर उद्गार दिया था!
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

हाँ, तुम्हारी मृदुल इच्छा,,
हाय, मेरी कटु अनिच्छा।
था बहुत माँगा ना तुमने किन्तु वह भी दे ना पाया,,
था तुम्हें मैंने रुलाया।।


स्नेह का वह कण तरल था,,
मधु न था, न सुधा-गरल था।
एक क्षण को भी, सरलते, क्यों समझ तुमको न पाया,,
था तुम्हें मैंने रुलाया।।


बूँद कल की आज सागर,,
सोचता हूँ बैठ तट पर।
क्यों अभी तक डूब इसमें कर न अपना अंत पाया,,
था तुम्हें मैंने रुलाया।।

जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला,,
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ।


जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला,,
जिस दिन मेरी चेतना जगी मैंने देखा।
मैं खड़ा हुआ हूँ इस दुनिया के मेले में,,
हर एक यहाँ पर एक भुलाने में भूला।।


हर एक लगा है अपनी अपनी दै-लै में,,
कुछ देर रहा हक्का-बक्का, भौचक्का-सा।
आ गया कहाँ, क्या करूँ यहाँ, जाऊँ किस जा,,
फिर एक तरफ से आया ही तो धक्का-सा।।


मैंने भी बहना शुरू किया उस रेले में,,
क्या बाहर की ठेला-पेली ही कुछ कम थी।
भीतर भी भावों का ऊहापोह मचा,,
जो किया, उसी को करने की मजबूरी थी।।


जो कहा, वही मन के अंदर से उबल चला,,
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला।
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ,,
जो किया कहाँ, माना उसमें क्या बुरा भला।

Harivanshrai Bachchan famous

मेला जितना भड़कीला रंग रंगीला था,,
मानस के अन्दर उतनी ही कमज़ोरी थी।
जितना ज़्यादा संचित करने की ख़्वाहिश थी,,
उतनी ही छोटी अपने कर की झोरी थी।।


जितनी ही बिरमे रहने की थी अभिलाषा,,
उतना ही रेले तेज ढकेले जाते थे।
क्रय-विक्रय तो ठण्ढे दिल से हो सकता है,,
यह तो भागा-भागी की छीना-छोरी थी।।


अब मुझसे पूछा जाता है क्या बतलाऊँ,,
क्या मान अकिंचन बिखराता पथ पर आया।
वह कौन रत्न अनमोल मिला ऐसा मुझको,,
जिस पर अपना मन प्राण निछावर कर आया।।


यह थी तकदीर बात मुझे गुण दोष न दो,,
जिसको समझा था सोना, वह मिट्टी निकली।
जिसको समझा था आँसू, वह मोती निकला,,
जीवन की आपा-धापी में कब वक़्त मिला।।


कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ,,
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
मैं कितना ही भूलूँ, भटकूँ या भरमाऊँ,,
है एक कहीं मंजिल जो मुझे बुलाती है।।


कितने ही मेरे पाँव पड़े ऊँचे-नीचे,,
प्रतिपल वह मेरे पास चली ही आती है।
मुझ पर विधि का आभार बहुत-सी बातों का,,
पर मैं कृतज्ञ उसका इस पर सबसे ज़्यादा।।


नभ ओले बरसाए, धरती शोले उगले,,
अनवरत समय की चक्की चलती जाती है।
मैं जहाँ खड़ा था कल उस थल पर आज नहीं,,
कल इसी जगह पर पाना मुझको मुश्किल है।।


ले मापदंड जिसको परिवर्तित कर देती,,
केवल छू-कर ही देश-काल की सीमाएँ।
जग दे मुझपर फैसला उसे जैसा भाए,,
लेकिन मैं तो बे-रोक सफर में जीवन के।।


इस एक और पहलू से होकर निकल चला,,
जीवन की आपा-धापी में कब वक़्त मिला।
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ,,
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।।

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