राहत Indauri- 30+ Love Poetry Hindi Collection

राहत Indauri वो कलाकार हैं जो अपने अंदाज में झूमकर इस कला को बखूबी अंजाम देते थे।
राहत इंदौरी के शेर हर लफ्ज़ के साथ मुहब्बत की नई शुरुआत करते हैं,
यही नहीं वो अपनी गजलों के जरिए हस्तक्षेप भी करते हैं। व्यवस्था को आइना भी दिखाते हैं।
उनके द्वारा लिखे गए कुछ शेर और शायरियां यहां पढ़ें।

1. बादशाहों से भी फेके हुए सिक्के ना लिए,,
हमने खैरात भी मांगी है तो खुद्दारी से।

2. बन के इक हादसा बाज़ार में आ जाएगा,,
जो नहीं होगा वो अखबार में आ जाएगा।

3. लोग हर मोड़ पे रुक रुक के संभलते क्यों है,,
इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यों हैं।
मोड़ होता है जवानी का संभालने के लिए,,
और सब लोग यही आके फिसलते क्यों हैं।।

4. बहुत ग़ुरूर है दरिया को अपने होने पर,,
जो मेरी प्यास से उलझे तो धज्जियां उड़ जाएं।

5. साँसों की सीडियों से उतर आई जिंदगी,,
बुझते हुए दिए की तरह जल रहे हैं हम।
उसों की धुप , जिस्म का दरिया सुखा गयी,,
हैं हम भी आफताब , मगर ढल रहे हैं हम।।

6. कॉलेज के सब बच्चे चुप हैं कागज की इक नाव लिए,,
चारों तरफ़ दरिया की सूरत फैली हुई बेकारी है।

7. इश्क में पीट के आने के लिए काफी हूँ,,
मैं निहत्था ही जमाने के लिए काफी हूँ।
हर हकीकत को मेरी, खाक समझने वाले,,
तेरी नींद उड़ाने के लिए काफी हूँ।।
एक अखबार हूँ, औकात ही क्या मेरी,,
मगर शहर में आग लगाने के लिए काफी हूँ।

8. उस आदमी को बस इक धुन सवार रहती है,,
बहुत हसीन है दुनिया इसे ख़राब करूं।

9. दिलों में आग, लबों पर गुलाब रखते हैं,,
सब अपने चहेरों पर, दोहरी नकाब रखते हैं।
हमें चराग समझ कर भुझाना पाओगे,,
हम अपने घर में कई आफ़ताब रखते हैं।।

राहत Indauri Collection
राहत Indauri

10. जुबां तो खोल, नजर तो मिला, जवाब तो दे,,
मैं कितनी बार लुटा हूँ, हिसाब तो दे।

11. फूलों की दुकानें खोलो, खुशबू का व्यापार करो,,
इश्क़ खता है तो, ये खता एक बार नहीं, सौ बार करो।

12. अब ना में हूँ, ना बाकी हैं जमाने मेरे,,
फिर भी मशहूर हैं, शहरों में फसाने मेरे।
ज़िन्दगी है तो नए ज़ख्म भी लग जाएंगे,,
अब भी बाकी है कई दोस्त पुराने मेरे।।

13. फकीरी पे तरस आता है
अपने हाकिम की फकीरी पे तरस आता है,,
जो गरीबों से पसीने की कमाई मांगे।

14. लू भी चलती थी, तो बादे शबा कहते थे,,
पांव फैलाये अंधेरो को दिया कहते थे।
उनका अंजाम तुझे याद नही है शायद,,
और भी लोग थे जो खुद को खुदा कहते थे।।

15. बहुत हसीन है दुनिया
आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो,,
ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो।

16. किसने दस्तक दी, दिल पे, ये कौन है,,
आप तो अन्दर हैं, बाहर कौन है।

17. ये हादसा तो किसी दिन गुजरने वाला था,,
मैं बच भी जाता तो एक रोज मरने वाला था।

18. लवे दीयों की हवा में उछालते रहना,,
गुलो के रंग पे तेजाब डालते रहना।
में नूर बन के ज़माने में फ़ैल जाऊँगा,,
तुम आफताब में कीड़े निकालते रहना।।

19. अंदर का ज़हर चूम लिया
अंदर का ज़हर चूम लिया धुल के आ गए,,
कितने शरीफ़ लोग थे सब खुल के आ गए।

20. कहीं अकेले में मिल कर झिंझोड़ दूँगा उसे,,
जहाँ जहाँ से वो टूटा है जोड़ दूँगा उसे।

21. रोज तारों को नुमाइश में ख़लल पड़ता है,,
चाँद पागल है अँधेरे में निकल पड़ता है।

राहत Indauri Poetry

22. कभी महक की तरह हम गुलों से उड़ते हैं,,
कभी धुएं की तरह पर्वतों से उड़ते हैं।
ये केचियाँ हमें उड़ने से खाक रोकेंगी,,
की हम परों से नहीं हौसलों से उड़ते हैं।।

23. हर एक हर्फ़ का अंदाज़ बदल रखा हैं,,
आज से हमने तेरा नाम गजल रखा हैं।
मैंने शाहों की मोहब्बत का भरम तोड़ दिया,,
मेरे कमरे में भी एक “ताजमहल” रखा हैं।।

24. एक चिंगारी नज़र आई थी बस्ती में उसे,,
वो अलग हट गया आँधी को इशारा कर के।

25. इन रातों से अपना रिश्ता जाने कैसा रिश्ता है,,
नींदें कमरों में जागी हैं ख़्वाब छतों पर बिखरे हैं।

26. गुलाब, ख्वाब, दवा, ज़हर , जाम क्या क्या है,,
में आ गया हूँ, बता इंतज़ाम क्या क्या हैं।
फ़क़ीर, शाह, कलंदर, इमाम क्या क्या हैं,,
तुझे पता नहीं, तेरा गुलाम क्या क्या हैं।।

27. नींद से मेरा ताल्लुक़ ही नहीं बरसों से,,
ख़्वाब आ आ के मेरी छत पे टहलते क्यूं हैं।

28. हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे,,
कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते।

29. जवानिओं में जवानी को धुल करते हैं,,
जो लोग भूल नहीं करते, वो भूल करते हैं।
अगर अनारकली हैं सबब बगावत का,,
सलीम हम तेरी शर्ते कबूल करते हैं।।

30. मोड़ होता है जवानी का सँभलने के लिए,,
और सब लोग यहीं आ के फिसलते क्यूं हैं।

राहत Indauri

31. इश्क ने गूथें थे जो गजरे नुकीले हो गए,,
तेरे हाथों में तो ये कंगन भी ढीले हो गए।
फूल बेचारे अकेले रह गए है शाख पर,,
गाँव की सब तितलियों के हाथ पीले हो गए।।

32. सफर की हद है वहां तक की कुछ निशान रहे,,
चले चलो की जहाँ तक ये आसमान रहे।

33. सरहदों पर तनाव हे क्या,,
ज़रा पता तो करो चुनाव हैं क्या।
शहरों में तो बारूदो का मौसम हैं,,
गाँव चलों अमरूदो का मौसम हैं।।

34. मेरा नसीब, मेरे हाथ कट गए वरना
मैं तेरी माँग में सिन्दूर भरने वाला था

35. जुबां तो खोल, नज़र तो मिला, जवाब तो दे,,
में कितनी बार लुटा हूँ, मुझे हिसाब तो दे।
तेरे बदन की लिखावट में हैं उतार चढाव,,
में तुझको कैसे पढूंगा , मुझे किताब तो दे।।

36. लोग हर मोड़ पर रुक – रुक के संभलते क्यों है


लोग हर मोड़ पर रुक – रुक के संभलते क्यों है,,
इतना डरते है तो फिर घर से निकलते क्यों है।


मैं ना जुगनू हूँ, दिया हूँ, ना कोई तारा हूँ,,,
रौशनी वाले मेरे नाम से जलते क्यों हैं।।


नींद से मेरा ताल्लुक ही नहीं बरसों से,,
ख्वाब आ-आ के मेरी छत पे टहलते क्यों हैं।


मोड़ तो होता हैं जवानी का संभलने के लिये,,
और सब लोग यही आकर फिसलते क्यों हैं।।

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