“माँ” (अक्षर एक रूप अनेक)

"माँ" (अक्षर एक रूप अनेक)

माँ अक्षर भले ही एक हो, मगर इस अक्षर में हज़ारों एहसास बसे हुए हैं।


का सिर्फ हमें जन्म देने वाली ही नहीं, जो हर पल खुद से ज्यादा जो हमारी फिक्र करती है,

वो भी एक माता का स्वरूप होती है।

भले ही रिश्ता कोई भी हो एक औरत/लड़की में मातृत्व की भावना जन्म से ही होती है।

अब चाहे वो एक बहन हो, बुआ हो या मौसी हो। हर औरत के अंदर एक माँ बसी होती है।

माँ सिर्फ हमें जन्म ही नहीं देती, हमें जीने का ज़रिया भी देती है। कहते हैं, हमारा पहला गुरु पहला मित्र हमारी माँ होती है।


माँ ही हमें बोलना और चलना सिखाती है, हमारे साथ खेलती है, बातें करती है, खुद से भी ज्यादा हमारी परवाह करती है।


उम्र के पड़ाव पर संतान के अंदर भले ही प्रेम में कमी आ जाए लेकिन माँ के लिए उसकी संतान हमेशा बालक ही रहती है।


हम लड़ते, झगड़ते हैं। और सोचते हैं, के हमें ये नहीं समझ सकते,
लेकिन हम उनकी अहमियत नहीं समझ पाते।

किसी ने सही कहा है

वो माँ की अहमियत क्या जाने जिनकी माँ होती है।
एक बार उनको भी देख लीजिए,
जिनकी आंखें सिर्फ माँ के लिए रोती हैं।।

हमारे पास जब वक्त होता है माँ को समझने का तब हम उन्हें कहाँ समझते हैं।


जब वो हमसे दूर हो जाती हैं, तब हमें उनकी अहमियत समझ में आती है।

और हम अपने किये पर बहुत पछताते हैं।

“माँ” (अक्षर एक रूप अनेक)

हम सोचते हैं, हमारी मां हमसे दूर हो गई है,
मगर हम ये भूल जाते हैं, कि एक माँ अपनी संतान से कभी दूर नहीं होती।
माँ का व्यक्तित्व एक ऐसा व्यक्तित्व है, जिसको मृत्यु चाह कर भी नहीं मार सकती।
हम भले ही न देख पाएं, मगर हमारी माँ हमें और हमारे जीवन की कोशिशों को देखती है।
वो हमें सम्भलते देख खुश होती है, के मेरी सन्तान धीरे धीरे बड़ी हो रही है, वो भीगी हुई पलकों से हमें निहारती है।

और हम अपने जीवन मे और तरक्की पाएं ऐसा आशीर्वाद देती है।
जब भी हम दुखी होते हैं और जीवन मे खुद को अकेला पाते हैं, तब भी कोई हमारे साथ होता है।


और वो कोई और नही हमारी माँ होती है। जो चुपके से हमारे पास आकर बैठ जाती है।

"माँ" (अक्षर एक रूप अनेक)

और बोलती है,

“बेटा तुम क्यों खुद को अकेला समझ रहे हो, मै हूँ न तुम्हारे साथ और हमेशा रहूंगी।

अब तू उठ और फिर से खड़ा हो मैने तुझे इसलिए अकेला नही छोड़ा के एक दिन हिम्मत हार के बैठ जाए,मैने तुझे इसलिए अकेला छोडा ताकि तू अपने दम पर कुछ कर दिखाए।
तू फिक्र मत कर में हमेशा तेरे साथ हूँ, तुझसे दूर जा भी नहीं सकती।
जब भी तुझे मेरी याद आये बस आवाज देना में तेरे पास ही मिलूंगी।

अब और उदास मत हो खुद को संभाल और तरक्की की ओर आगे बढ़।”

और हमें फिर से खड़े होने की हिम्मत देती है।

हम भले ही अपने कानों से उनकी आवाज न सुन पाए मगर हमारे दिल में जो उनका दिया गया लहू होता है

वो उनकी आवाज को सुन लेता है और हमें फिर से खड़े होने को हिम्मत देता है।

माँ,,,,
 अक्षर एक जरूर है,,,
 पर इसमें मेरी दुनियां बसती है।
 आसमान से!!!!!
 रोज देखती है, जीने की मेरी कोशिशें,,,
 सोच कर के औलाद मेरी अब बड़ी हो रही है,,
  आंखे भिगो अपनी, वो मुझे संभलते देख हसती है।।

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